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मैं भी चटका टूटा बिखरा थोड़ा थोड़ा, जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।

मैं भी चटका टूटा बिखरा थोड़ा थोड़ा, जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।

Raghav Shukla Poet

साहित्य प्रेमियों के लिए रविवार अब विशेष होता जा रहा है। नई-नई रचनाओं को पढ़ना कितना अच्छा लगता है। एक कवि, गीतकार अथवा ग़ज़लकार की दृष्टि से दुनिया को देखना सचमुच हृदय को एक अलग तरह का आनंद प्रदान करता है।

यदि आप भी कविता, कहानी, गीत, ग़ज़ल या साहित्य के किसी भी विधा के रचनाकार हैं तो आप भी अपनी रचनाएँ प्रकाशनार्थ हमें निम्नलिखित ई-मेल अथवा व्हाट्सएप पर भेज सकते हैं।

-सत्येन्द्र गोविन्द
ई-मेल:satyendragovind@gmail.com
व्हाट्सएप नं०-6200581924

साहित्य के रविवारीय अंक में इस बार हम लेकर आए हैं एक बहुत ही बेहतरीन गीतकार और उतने ही अच्छे इन्सान "राघव शुक्ल" जी की कुछ रचनाएँ। आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं-

■पुस्तकें-साझा संकलन
1.गुनगुनाएँ गीत फिर से
2.दोहे के सौ रंग
3.पांव गोरे चांदनी के
4.नई सदी के नए गीतकार
■कविता प्रकाशन
साहित्य मंजरी ,साहित्य गंधा, बाल वाटिका, गीत गागर, राष्ट्र राज्य, अमर उजाला काव्य पांचाल प्रवाह, शेषामृत, हस्ताक्षर आदि पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन
■विशेष
देश की प्रतिष्ठित वेबसाइट "कविताकोश" पर उपस्थिति

आइए पढ़ते हैं "राघव शुक्ल" जी की पाँच बेहतरीन रचनाएँ-
_________________________________
1.ग्लोब सरीखी इस दुनिया में भटके हम

खोज रहे थे हम सारी खुशियाँ जग में
लेकिन असली मस्ती थी मन के भीतर
सारी उम्र गुजारी खोज नहीं पाए
इस दुनिया के मानचित्र में अपना घर

ग्लोब सरीखी इस दुनिया में भटके हम
गोल घूमकर कितने चक्कर खाए थे

कितने रस्ते नापे कहीं नहीं पहुंचे
जहां खड़े थे वही लौटकर आए थे
पर्वत जंगल मैदानों में घूम लिए
मिला न हमको अपने मन का गांव शहर

जब-जब रहे सफर में आशावादी थे
बांध रहे थे हम मंजिल के मंसूबे
नदी चुनी जो भी हमने उसको खेकर
सदा अंत में सागर में जाकर डूबे
सभी दिशाओं में जल ही जल था लेकिन
प्यासा कंठ रहा ये सूखे रहे अधर

सपनों का आकाश चूमने की खातिर
उम्मीदों के हमने पंख लगाए थे
भरी उड़ाने जब मन के संपाती ने
सूरज ने तब उसके पंख जलाए थे
उड़ते उड़ते मानो मन की चिड़िया ने
काट लिए अपने हाथों से अपने पर
____________________________________
2.गाण्डीव उठाओ हे अर्जुन

अब नहीं चाहिए पाँच गाँव,भिक्षा पर मत संतोष करो।
गाण्डीव उठाओ हे अर्जुन,अब धर्मयुद्ध का घोष करो।।

वन उपवन सारे भटक चुके,तुम अमन शान्ति की आशा में।
क्या मिला हाथ क्या लगा तुम्हें, बोले याचक की भाषा में।
दुश्मन को दर्पण दिखलाओ,अब खुद को तुम निर्दोष करो।
गाण्डीव उठाओ हे अर्जुन,अब धर्मयुद्ध का घोष करो।।

बोलेगी रणभेरी रण में,हो शंखनाद प्राचीरों से।
अरि के मस्तक का चयन करे, कह दो तरकश के तीरों से।
पौरुष को पर्वत सा कर लो,अब इसे नहीं मधुकोश करो।
गाण्डीव उठाओ हे अर्जुन,अब धर्मयुद्ध का घोष करो।।

तुम वज्र इन्द्र के अटल,विजयगाथा के परम चितेरे हो।
कुन्ती के हो पुत्र द्रोण के शिष्य,सखा तुम मेरे हो।
अब क्षमादान दे चुके बहुत,अब समय आ गया रोष करो।
गाण्डीव उठाओ है अर्जुन,अब धर्मयुद्ध का घोष करो।।
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3.जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा

मैं भी चटका टूटा बिखरा थोड़ा थोड़ा।
जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।

किर्च किर्च चुभ गयी कलेजे भीतर जाकर
आँसू एक न आया जख़्म अनोखा पाकर
धीरे धीरे दर्द बना नासूरी फोड़ा
जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।

बिखरे दर्पण को समेट कर फेंका जैसे
कहाँ गया मैं किधर गया मैं खोजूँ कैसे
ढूँढ रहा था पानी पर मैं उसे निगोड़ा
जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।

इस तलाश में हाथ लगी केवल तन्हाई
मिली मुझे माशूका वो मेरी परछाई
दोनों थे तनहा दोनों ने नाता जोड़ा
जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।
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4.बहुत दिनों के बाद हुआ है

बहुत दिनों के बाद हुआ है
फिर खुद से संवाद हुआ है

ज्ञात हुआ यह मानव जीवन
प्रभु से मिला प्रसाद हुआ है

हमने गीत लिखा है मानो
पीड़ा का अनुवाद हुआ है

तन को हरि की गोद चाहिए
मन मेरा प्रहलाद हुआ है

सांसे राम राम जपती हैं
भीतर अनहद नाद हुआ है

मृत्यु मिली है मानो पंछी
पिंजरे से आजाद हुआ है

मां की सीखें गांठ बांध ली
हमें सुभाषित याद हुआ है

श्रीमद्भगवद्गीता पढ़ ली
मेरा दूर विषाद हुआ है
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5.वो मेरा बीता कल दे दो

ठहरे जल में हलचल दे दो
सूखे तरु में कोंपल दे दो

कितने मौसम बीत गए हैं
प्रभु इन शाखों में फल दे दो

कितने प्रश्न लिए बैठा हूँ
मेरे प्रश्नों का हल दे दो

अगले पल का पता नहीं है
वो मेरा बीता कल दे दो

पूरा गांव मुबारक तुमको
मुझको बूढ़ा पीपल दे दो

चुम्बन दे न सको पलकों पर
इन आँखों में काजल दे दो

खाने को दे दो तुलसीदल
पीने को गंगाजल दे दो

-राघव शुक्ल
(पुत्र-श्री राम अवतार शुक्ल)
जन्मतिथि-25.06.1988
पता-मोहम्मदी लखीमपुर खीरी
संप्रति-अध्यापक बेसिक शिक्षा
मोबाइल-9956738558




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