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सच में आँसू ही किसी के गम को धो देता है तो, आज पूरी रात हमको यूँ ही रोने दीजिये

सच में आँसू ही किसी के गम को धो देता है तो, आज पूरी रात हमको यूँ ही रोने दीजिये

Rupam jha poet

कल दीपावली थी और आज गोवर्धन पूजा तो सबसे पहले आप सभी को हमारी पूरी टीम की तरफ से ढेरों शुभकामनाएँ,इन त्योहारों के बीच अपने पटल पर साहित्य को लेकर हम पुनः उपस्थित हैं।

हमें इस बात की बेहद ख़ुशी है कि  आप सभी का प्यार निरंतर मिल रहा है। आप अपना सहयोग ऐसे ही बनाए रखें और पढ़ते रहें 'रविवारीय साहित्यिकी' और इस बार की रचनाएँ कैसी लगी कमेंट कर के ज़रूर बताएँ।

यदि आप भी कविता,कहानी,गीत,ग़ज़ल या साहित्य के किसी भी विधा के रचनाकार हैं तो आप भी अपनी रचनाएँ प्रकाशनार्थ हमें निम्नलिखित ई-मेल अथवा व्हाट्सएप पर भेज सकते हैं।

-सत्येन्द्र गोविन्द
ई-मेल:satyendragovind@gmail.com
व्हाट्सएप नं०-6200581924

साहित्य के इस रविवारीय अंक में प्रस्तुत है आदरणीया "रूपम झा" जी की पाँच ग़ज़लें।आपकी प्रकाशित पुस्तकें-साझा संकलन : गुनगुनाएँ गीत फिर से-1+2+3, दोहा दर्शन, दोहा मंथन
विधाएँ : कहानी, लघुकथा, गीत, दोहा, ग़ज़ल
विशेष : हिन्दी और मैथिली भाषा में निरंतर लेखन एवं देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उनका प्रकाशन।

आइए पढ़ते हैं "रूपम झा" जी की पाँच ग़ज़लें-
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ग़ज़ल-1

आपने जो भी किया, अच्छा किया
रख लिया है फासला, अच्छा किया

मेघ तुमने भूख से रख दुश्मनी
सिंधु को सावन दिया, अच्छा किया

बोलती तो टूट जाता, वास्ता
चुप रही, सब सुन लिया, अच्छा किया

मुफ़लिसों को मुफ़लिसी करके अदा
हो गये हो तुम ख़ुदा, अच्छा किया

मेरे दिल में घर बनाकर ए सनम!
फिर बदल डाला पता, अच्छा किया
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ग़ज़ल-2

तीरगी में रोशनी का बीज बोने दीजिये
कुछ उजालों का हमें हकदार होने दीजिये

सच में आँसू ही किसी के गम को धो देता है तो
आज पूरी रात हमको यूँ ही रोने दीजिये

दर्द की हद का हमें अनुमान भी हो जाएगा
अब गमो के पर्वतों को यूं ही ढोने दीजिये

ख़्वाब मेरे मुफलिसी में, बेबसी थे जी रहे
मेरे इन ख़्वाबों को अब चुपचाप सोने दीजिये

शिद्दतों से माँगती थी, आप वो वरदान हैं
अब मिले हैं तो मुझे ख़ुद को सँजोने दीजिए
___________________________________
ग़ज़ल-3

ऐ नये साल तू खुशियों का ख़ज़ाना ले आ
एक भूखे के लिए अब के तो खाना ले आ

बात करता हो न दहशत की कोई भी जिसमें
मेरे बच्चों के लिए ऐसा ज़माना ले आ

दर बदर ज़िन्दगी जो रोज़ भटक जाती है
उसकी खातिर तो कोई नर्म ठिकाना ले आ

जिनके होठों की हँसी मुद्दतों से ग़ायब है
उनके लब पर कोई मीठा-सा तराना ले आ

थक गए लोग हवाओं के थपेड़े खाकर
आनेवाला है जो हर पल वो सुहाना ले आ
___________________________________
ग़ज़ल-4

तू हर पल बाँटता फ़िरता ज़हर है
बता तू आदमी या ज़ानवर है

कई ग़ज की ज़ुबां तेरी है लेकिन
तेरा क़द, सच कहूँ तो हाथ भर है

हमेशा देख मत पावों के छाले
कठिन कुछ और आगे का स़फर है

अँधेरा उस जगह बसता भी कैसे
जहाँ सूरज किया करता बसर है

यहाँ खुशियों पे भी पाबंदियां हैं
न जाने किस तरह का यह शहर है

दिखाऊँ किस तरह दिल खोलकर मैं
कि तेरे पास ही मेरा ज़िगर है
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ग़ज़ल-5

मुझको क्या दुनिया से डर है
जब तू ही मेरे भीतर है

वो मुझको नापेगा कैसे
उसका क़द ख़ुद बित्ता भर है

मुझको क्या करना काशी से
मेरा घर, मेरा मगहर है

रोज़ अँधेरा देह नोचता
आख़िर कैसा सभ्य शहर है

मुझको मत पैसे दिखलाओ
मोल मेरा ढाई आखर है

हिन्दी, उर्दू में तुम बाँटो
मेरा हिन्दुस्तानी स्वर है

सब कुछ है किरदार जहाँ में
कीमत क्या, बस एक नज़र है

- रूपम झा
पति : मनोज कुमार झा
शिक्षा : एम. ए.  (हिन्दी+मैथिली)
पता : ग्राम+पो- बीरपुर, वाया-मंझौल, बेगूसराय -851127
e mail : manojjhabirpur@gmail. com





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