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तपते रेगिस्तान में नीम की छाँव है कविता, भागते शहर के बीच एक गांव है कविता

तपते रेगिस्तान में नीम की छाँव है कविता, भागते शहर के बीच एक गांव है कविता

Avinash Kumar Pandey Poet

जय हो!आज रविवार है और हम प्रत्येक सप्ताह की तरह पुन: उपस्थित हैं कुछ नई रचनाओं के साथ।हमेशा हमारा प्रयास यही रहता है कि हम आपको अच्छी-अच्छी रचनाओं से मिलवाते रहे।

यदि आप भी गीत,ग़ज़ल,कविता या साहित्य के किसी भी विधा के रचनाकार हैं तो आप प्रकाशन के लिए अपनी रचनाएँ निम्नलिखित ई-मेल अथवा व्हाट्सएप पर भेज सकते हैं-satyendragovind@gmail.com/6200581924

रविवारीय साहित्यिकी में इस बार हम "अविनाश कुमार पाण्डेय" जी की रचनाओं के साथ उपस्थित हैं।आपका संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है-

जन्म: 26मार्च 1975
जन्म स्थान: बगहा
शिक्षा: एम.ए. हिन्दी साहित्य,पत्रकारिता में स्नातकोत्तर,पुस्तकालय विज्ञान में स्नातक, शोधार्थी(पीएच. डी.हिन्दी) ।
संप्रति: पुस्तकालय अध्यक्ष
पंडित उमाशंकर तिवारी महिला महाविद्यालय बगहा ।
अभिरुचि:काव्य पाठ,मंच संचालन  एवं स्वतंत्र
पत्रकारिता ।
संपादन: स्पंदन(हिन्दी काव्य संग्रह),स्पंदन (भोजपुरी काव्य संग्रह),गीतामृत के संपादक मंडल में।
पूर्व प्रकाशन: कादम्बिनी सहित देश की तमाम प्रतिष्ठत पत्र- पत्रिका एवं समाचार पत्रों में।
प्रसारण:आकाशवाणी पटना और गोरखपुर से कविता पाठ और वार्ता का लगातार प्रसारण।

आइए पढ़ते हैं "अविनाश कुमार पाण्डेय" जी की चार रचनाएँ-
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1.कोरोना

दुनिया के थानेदार की
हेकड़ी भी गुम है
तीनफुटिया सेना की
सबसे बडी टुकड़ी भी मौन है
तानाशाह का होश भी
ठीकाने लग गया है
उसके परमाणु हथियारों का जखीरा
धरा का धरा रह गया है ।
क्या गोरे क्या काले
चाहे हो आतंक के रखवाले
सबको
एक घाट पे
पानी पिलाया है
कोरोना
हम सबको
हमारी औकात का
आईना  दिखाया है तुमने
कोरोना
लेकिन !
अब
बस करो ना,
कोरोना।
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2.तेरे शहर में हम

न जाने कितने मकान
जिसका रंगरोशन हमने किया
कितनी कोठियां
जिसके लाँन को हमने
सतरंगी बनाया
कितने ही गगनचुंबी अट्टालिकाओं में
मिली पड़ी हैं
हमारे पसीने की बू ।
सब्जी-फल के ठेले
गोलगप्पे-पाव-भाजी के मेले
होटलों के थाल
बड़े-बड़े माँल
कितने ही रसोईघर में
मिली पड़ी हैं
हमारे हाथों की खुश्बू ।
कितने ही कार्यालयों के
फाइलों में
धूल के साथ
आज भी दबी पड़ी हैं
तेरी छींके रामू ।
तेरे  शहर को
सजाने-सवारने
बनाने और बढ़ाने
के लिए
हमने क्या-क्या नहीं किया
लेकिन कुदरत ने एक फूंक क्या मारी
हम ना ही रोटी पा सके
ना ही शरण
बेशर्म
तेरे शहर में हम।
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3.जिन्दा रहेगी कविता

सामाजिक विषमता में
समरसता का संगीत है कविता
हार में जीत है कविता
अभावों में उमंगो का
गीत है कविता
तपते रेगिस्तान में
नीम की छाँव है कविता
भागते शहर के बीच
एक गांव है कविता
दुनिया में विज्ञान रहे ना रहे
सभ्यता का नाम रहे ना रहे
कविता जिन्दा रहेगी
बहुत पहले
जब पढी जाती थी कविता
आज
जब लिखी जाती है कविता
तब भी है कविता
अब कागज पर
कम उकेरी जाती है कविता
आज नेट पर
देखी जा रही है कविता
फेसबुक पर आज
खूब लिखी जा रही है कविता
तब भी है ये कविता
आगे भी रहेगी कविता
कविता व्यापार से नहीं
कविता बाजार से नहीं
कविता कारोबार से नहीं
कविता जिन्दा रहेगी
अपने सामाजिक सरोकार से
और
जब तक जिन्दा रहेगी कविता
तभी तक जिन्दा रहेगी मानवता
बची रहेगी
हमारी सभ्यता
तथा जीवन के सौंदर्य
जब तक कवि के हृदय में
भाव जिन्दा रहेंगे
अभाव में भी
जिन्दा रहेगी कविता।
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4.उम्मीद

कितनी भी
काली हो रात
नहीं दिखे
जब कोई राह
तब भी
उम्मीद की बाती
जलाये रखना
क्योंकि
हाड़ कपकपाती ठंड
और
घने कोहरे की चादर ओढे
बेरहम मौसम
लाख कोशिश कर ले
हमारे हौषलों को रोकने की
लेकिन !
भुल जाता है वो
तभी तो
असली परीक्षा होती है
सूरज के निकलने की।

-अविनाश कुमार पाण्डेय,
रतनमाला,पोस्ट-बगहा,थाना-बगहा, जिला -प. चम्पारण(बिहार).पिन-845101
सम्पर्क सूत्र : 9939195501.




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