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अदब तहज़ीब में पल के नफासत को नही भूला, बना कर प्रेम का मंदिर इबादत को नही भूला

अदब तहज़ीब में पल के नफासत को नही भूला, बना कर प्रेम का मंदिर इबादत को नही भूला

Govind Sharma Tanha poet

प्रत्येक रविवार की तरह हम पुन: उपस्थित हैं कुछ नई रचनाओं के साथ।हमेशा हमारा प्रयास यही रहता है कि हम आपको अच्छी-अच्छी रचनाओं से मिलवाते रहें।

यदि आप भी गीत,ग़ज़ल,कविता या साहित्य के किसी भी विधा के रचनाकार हैं तो आप प्रकाशन के लिए अपनी रचनाएँ निम्नलिखित ई-मेल अथवा व्हाट्सएप पर भेज सकते हैं-satyendragovind@gmail.com/6200581924

रविवारीय साहित्यिकी में इस बार हम गोविन्द शर्मा "तन्हा" जी की रचनाओं के साथ उपस्थित हैं।आपकी शिक्षा एम.ए इतिहास,हिंदी साहित्य है।विधा-गीत,ग़ज़ल, मुक्तक,
आपके तीन साझा काव्य संग्रह आ चुके हैं तथा देश की विभिन्न पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती रहती हैं।

आइए पढ़ते हैं गोविन्द शर्मा "तन्हा" जी की कुछ रचनाएँ-
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1.जमाना प्यार को दुश्मन समझता है

जमाना प्यार को दुश्मन समझता है करे क्या हम,
हमारे इश्क़ की इतनी सदाकत है मिरे दिलबर,
तुम्हारे बिन हसीं जीवन बिखरता है करे क्या हम,

तुम्हारे प्यार में पल पल बिखरता है कोई तन्हा,
तुम्हारी चाह में दर दर भटकता है कोई तन्हा,
ज़माना क्या भला समझे मेरे इस दिल के रंजोगम,
हमारे दर्द को बेशक़ समझता है कोई तन्हा।।

जला कर खुद को तेरी आँख का काजल बना लेंगे,
धरा जो तुम बनो खुद को यहाँ बादल बना लेंगे,
मिलन अपना न हो पाया मुनासिब फ़िर यही होगा,
तुम्हारी याद में खुद को सनम पागल बना लेंगे।।
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2. मुक्तक-1
बहारों के हसीं आलम तुम्हारी याद आती है,
दिखे जो फूल पे शबनम तुम्हारी याद आती है,
कभी खामोशियाँ भी घेर लेती है खयालो को,
कभी बेचारगी के गम तुम्हारी याद आती है।।

मुक्तक-2

जिंदगी के ख़्वाब सारे तोड़कर,
लौट आये प्रीत का दर छोड़कर,
तुमने थामा है किसी का हाथ और
आ गये हम प्रीति का रथ मोड़कर।।
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3. मुक्तक-3
अदब तहज़ीब में पल के नफासत को नही भूला,
बना कर प्रेम का मंदिर इबादत को नही भूला,
भले हो फासले कितने मग़र दिल आज भी हमदम,
किसी भी मोड़ पर तेरी  मुहब्बत को नही भूला।।

मुक्तक-4

लबों की तिशनगी में अब उतरता ज़ाम भारी है,
ग़मों की राह में पल पल गुजरती शाम भारी है,
तुम्हारे हिज्र में कटता हुआ ये वक़्त कहता है
मुहब्बत में हुए अलगाव का अंजाम भारी है।।___________________________________
4.प्रेम में बिछड़े हुए प्रेमी का ज़ख्म

प्रेम में
बिछड़े हुए प्रेमी का,
ज़ख्म
भर नही सकती कभी
कोई दवा।

उसके आंसुओं को
नही रोक सकता कभी
कोई ढाँढस।

उसके दर्द को कभी नही
मिटा सकती
हमदर्दी भरी सहानुभूति।

क्योंकि प्रेमी चाहते है
समाज की
खोखली दीवारों को
गिरा देना
उन रूढ़ रीति रिवाजों को
मिटा देना।।

जो घोट देते है गला अक्सर
मासूम प्रेम का
धर्म जाति के
निर्मम क्रूर हथियार से।।

-गोविन्द शर्मा "तन्हा"
एम.ए इतिहास,हिंदी साहित्य,
निवास स्थान- लूनकरनसर, (बीकानेर) राजस्थान




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